ग्रीन डायलेमा [ Green Dilemma]
आज पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन एक स्थापित सत्य है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक संस्थाओं के साथ- साथ देशों के स्तर पर अनेक प्रयास हो रहे हैं। इन प्रयासों के अंतर्गत पेरिस एग्रीमेंट एक महत्वपूर्ण बैठक मानी जाती है। जिसके तहत 2015 में सभी सदस्य देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ बिंदुओं पर चर्चा हुई। सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए आम सहमति व्यक्त किया। सभी देश भविष्य में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए राष्ट्रीय निर्धारित योगदान [ Nationally Determined contribution] नीति पर कार्य करने के लिए एकमत हुए। इस सहमति के अंतर्गत अलग-अलग देशों ने अगले कुछ वर्षों में नेट-जीरो उत्सर्जन की नीति के तहत कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त किया।
राष्ट्रीय निर्धारित योगदान के अन्तर्गत। अमेरिका और यूरोप ने 2050 तक जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा हैं। वहीं चीन और भारत ने क्रमशः 2060 और 2070 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की योजना बनाई है। इस प्रयास के तहत अलग-अलग क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को कैसे काम किया जाए? इस पर एक नीतिगत ढंग से योजनागत कारवाई देशों द्वारा की जा रही है। जैसे फांसिल फ्यूल, कोयला से उर्जा, की जगह सौर ऊर्जा, न्यूक्लियर ऊर्जा, ग्रीन हाईड्रोजन, पवन ऊर्जा और इसी तरह अन्य विकल्पों के माध्यम से भविष्य की उर्जा जरूरतों को पूरा करने पर काम हो रहा है। चीन और भारत बड़ी जनसंख्या वाले देश हैं। साथ ही इन देशों की उर्जा जरूरतें ज्यादा है। इसी कारण विकसित देशों से अलग इन देशों ने एक अनुकूलतम समय लेते हुए। प्रतिबद्धता के साथ कार्बन उत्सर्जन के लिए समयवद्ध ढंग से अलग-अलग प्रयास कर रहे हैं। जहां तक चीन की बात है। वहां बड़े पैमाने पर 2014 से लेकर 2023 तक सोलर आधारित उर्जा के लिए बड़े स्तर पर सौर पैनल का इंस्टालेशन किया गया है।
ताकि चीन भविष्य में अपनी पूरी ऊर्जा जरूर का लगभग 45% सोलर से प्राप्त कर सके । लेकिन इस उर्जा विकल्प के साथ कुछ परेशानियां भी आ रही हैं। इस स्थिति को चीन में हुए एक शोध में पाया गया है। एक तरफ कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सोलर पैनल के इंस्टॉलेशन हो रहे हैं जिसके कारण बायोडायवर्सिटी और ग्रीन क्षेत्रों में हास के साथ उसमें निवास करने वाले जीव जंतु और पशु पक्षियों के आवास नष्ट हो रहे हैं। इसका प्रभाव उनकी संख्या एवं वायोडायवर्सिटी पर पड़ रहा है। शोधार्थी ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि धरती को ग्रीन बनाने के प्रयास में सोलर उर्जा के लिए बड़े पैमाने पर सोलर इन्सटालेसन हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ पहले से मौजूद ग्रीन क्षेत्रों विशेषकर ग्रासलैन्ड और वायोडायवर्सिटी का नुकसान हो रहा है।
शोध के निष्कर्षो को बताते हुए शोधार्थी ने इस स्थिति को ग्रीन डायलेमा [ Green Dilemma] का नाम दिया है। ऐसी स्थिति में सोलर इंस्टॉलेशन को ऐसे स्थान पर लगाए जाने का सुझाव दिया गया है। जहां ग्रीनलैंड और ग्रासलैंड की अधिकता ना हो और इनका नुकसान कम से कम हो। इस शोध से भारत जैसे दूसरे अन्य सभी देश अपने भविष्य के सोलर प्रोजेक्ट को लगाते समय जैवविविधता पर पड़ने वाले संकट को तर्कसंगत ढंग से समाधान खोज सकते हैं और ग्रीन डायलेमा की स्थिति से बच सकते हैं।
![ग्रीन डायलेमा [ Green Dilemma] आधुनिक भारत[Objective N.C.E.R.T. M.C.Q’s Modern India]](https://samsamyikduniya.com/wp-content/uploads/2025/09/NK1-green-samsamyik-1140x570.jpg)